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रेंगाखार हिंगलाजनी मां का मंदिर वनांचल में आस्था का केंद्र

रेंगाखार जंगल वनांचल के केंद्र बिंदु में विराजमान है मां हिंगलाजिनी,400साल पुरानी बताई जाती है मंदिर, मंदिर का इतिहास कथा के रूप में बताया जाता है कि वनांचल के 6, 7 लोग लगभग 400 साल पहले बस्तर के हिंगलाजगढ़ गए थे जहां से मां हिंगलाजिनी को डोला में बैठा कर पैदल रेंगाखर 43 दोनों का सफर पूरा कर लाए थे, जिसकी स्थापना बरेंडा में करने की मनसा थी, जाते वक्त रेंगाखार के तालाब पार में रख कर तालाब में नहाना धोना शुरू कर दिए और वही खाना बनाकर खाएं, उसके बाद डोला उठाकर ले जाने की तैयारी हुई लेकिन डोला वहां से उठने नहीं लगा, टस से मस नहीं होने लगा, काफी लोग प्रयास किये, बहुत प्रयास किये कि उसे उठाया जा सके लेकिन उठाना संभव नहीं था, और मां की इच्छा थी कि उसकी स्थापना वहीं पर हो और वहीं पर उसकी स्थापना कर दिया गया। वनांचल क्षेत्र के केंद्र बिंदु रेंगाखार में सरोवर के बाजू में मां हिंगलाजिनी का प्राचीन मंदिर बस स्टैंड से आधा किलोमीटर की दूरी पर है, या मंदिर बहुत प्राचीन है आसपास के लोगों की मां हिंगलाजनी पर बड़ी आस्था है हर दुख को हरने वाली मां के दर्शन के लिए वनांचल क्षेत्र के अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र से भी अधिक से अधिक संख्या में लोग आते हैं, जो भी दर्शन करने आता है दर्शन के बाद घंटों तकमंदिर में बैठकर शांति महसूस करता है, मां हिंगलाजिनी के मंदिर के बाजू में एक बहुत बड़ा पीपल बरगद का पेड़ है जो बहुत अच्छा छांव देता है जहां बहुत सुकून और ठंडक महसूस किया जा सकता है, और वही बजरंगबली का मंदिर स्थित है, माय हिंगलाज ने मंदिर जैसे प्रवेश द्वार पहुंचते हैं वहां पर बहुत ही प्राचीन भगवान शंकर की भी मंदिर है, जहां दर्शन कर मंदिर की ओर भक्तगण आगे बढ़ते हैं, मंदिर की एक और तालाब आसपास जंगल खेत हरे-भरे नजारे जो मन को मोह लेते हैं, बताया जाता है कि मां हिंगलाज को बहुत साल पहले स्वर्गीय डोंगर सिंह ठाकुर जो यहां के राजा थे उनके द्वारा ही लांजीगढ़ से लाकर यहां पर स्थापना किया गया है। इस वर्ष मंदिर में 340 ज्योति क्लस जले हैं जिसमें 21 कलश घी के और 317 क्लस तेल के है, ज्योत जलाने वाले छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से लेकर अंबिकापुर तक के वक्त मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक के भक्त हैं, जो भी कर्मचारी, अधिकारी रेंगाखार क्षेत्र में पदस्थ रहे हैं और जो देवी से आस्था रखते हो आज भी यहां जो जलते हैं, साथ ही साथ आसपास के 50 किलोमीटर के लोगों को कोई भी दुख तकलीफ अगर होती है तो मां के नाम से ज्योत जलाने का मन्नत रखते हैं और नवरात्र के दोनों सीजन में चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र में जोत प्रज्वलित करते हैं। प्रतिदिन सैकड़ो के संख्या में यहां पर श्रद्धालु रोज आते हैं मंदिर की देखरेख राजा परिवार के दादा मदन कश्यप, बलराम मरकाम राजा जायसवाल सजवन परते एवं ग्राम समिति मंदिर का पूरा देखरेख लेखा-जोखा करती है।